आंख मूंदकर अपील पर हाईकोर्ट सख्त, एमपी सरकार पर 10 हजार का जुर्माना
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कानून की समुचित जानकारी और परीक्षण के बिना अपील दायर करने पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. जस्टिस ए.के. सिंह की एकलपीठ ने एक क्रिमिनल रिवीजन अपील को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि इस तरह की अपीलें न केवल अदालत का समय बर्बाद करती हैं, बल्कि राज्य के संसाधनों की भी अनावश्यक हानि करती हैं. अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए कि जुर्माने की राशि संबंधित दोषी अधिकारियों से वसूली जा सकती है.
मामला वाइल्ड एनिमल प्रोटेक्शन एक्ट 1972 से जुड़ा है. राज्य सरकार ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी, जिसमें जुगल किशोर नामक आरोपी को बरी कर दिया गया था, जबकि एक अन्य आरोपी को दोषी ठहराया गया था. ट्रायल कोर्ट के आदेश के बाद प्रकरण एडिशनल सेशंस जज, पन्ना के समक्ष पहुंचा. एडिशनल सेशंस जज ने 29 जून 2013 के आदेश में स्पष्ट किया था कि संबंधित अपील दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 378(4) के तहत हाईकोर्ट में प्रस्तुत की जानी चाहिए थी.
इसके बावजूद राज्य सरकार की ओर से क्रिमिनल रिवीजन अपील दायर की गई. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पाया कि अपील में यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया था कि एडिशनल सेशंस जज का आदेश किस प्रकार विधि के विपरीत है. अदालत ने कहा कि अधिकार क्षेत्र से जुड़े अहम मुद्दे को पहले ही निचली अदालत द्वारा तय किया जा चुका था, फिर भी बिना पर्याप्त कानूनी आधार के रिवीजन अपील दायर की गई.
जस्टिस ए.के. सिंह ने अपने आदेश में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून को ठीक से समझे बिना आंख मूंदकर अपील दाखिल करना उचित नहीं है. इस प्रकार की कार्यवाही से न केवल न्यायालय का कीमती समय व्यर्थ होता है, बल्कि सरकारी धन और प्रशासनिक संसाधनों की भी अनावश्यक बर्बादी होती है. कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अपील दायर करने से पहले विधि विभाग और महाधिवक्ता कार्यालय से समुचित विधिक परामर्श नहीं लिया गया प्रतीत होता है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक व्यवस्था पहले से ही लंबित मामलों के बोझ से दबी हुई है और ऐसे में बिना ठोस कानूनी आधार के दायर अपीलें स्थिति को और जटिल बनाती हैं. कोर्ट ने राज्य सरकार पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाते हुए क्रिमिनल रिवीजन अपील को खारिज कर दिया. साथ ही यह निर्देश भी दिया कि यह राशि संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल की जाए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही दोहराई न जाए.
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को प्रशासनिक जवाबदेही के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश सरकारी विभागों को यह संदेश देता है कि न्यायालय में कोई भी याचिका या अपील दायर करने से पहले विधिक प्रावधानों का गंभीरता से परीक्षण किया जाना आवश्यक है. अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि न्यायिक समय की बर्बादी को अब हल्के में नहीं लिया जाएगा.
इस फैसले के बाद सरकारी महकमों में अपीलों की प्रक्रिया और कानूनी सलाह की प्रणाली की समीक्षा किए जाने की संभावना जताई जा रही है. न्यायालय की सख्ती ने यह संकेत दे दिया है कि भविष्य में ऐसी लापरवाही पर और भी कड़े कदम उठाए जा सकते हैं.
संवाददाता :- आशीष सोनी

0 Comments