मतदाता सूची से नाम हटने पर मजदूर का फूटा गुस्सा, भावुक वीडियो ने खड़े किए प्रशासन पर सवाल


मध्यप्रदेश के इंदौर से सामने आए एक भावुक वीडियो ने मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे इस वीडियो में एक दैनिक वेतनभोगी मजदूर अपनी बुजुर्ग मां का हाथ पकड़कर कलेक्टर कार्यालय में शिकायत करते हुए नजर आ रहा है. मजदूर का आरोप है कि उसका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है और कई बार प्रयास करने के बावजूद उसकी शिकायत नहीं सुनी जा रही है. वीडियो में मजदूर भावुक होकर रोते हुए अपनी परेशानियां बताते दिखाई देता है, जिससे लोगों में सहानुभूति और प्रशासन के प्रति नाराजगी दोनों देखने को मिल रही है.

जानकारी के अनुसार यह मामला इंदौर कलेक्टर कार्यालय में आयोजित जनसुनवाई कार्यक्रम का बताया जा रहा है. जनसुनवाई के दौरान अतिरिक्त जिला कलेक्टर की निगरानी में नागरिकों की समस्याएं सुनी जा रही थीं. इसी दौरान एक व्यक्ति अपनी वृद्ध मां के साथ वहां पहुंचा और उसने आरोप लगाया कि उसका नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है. मजदूर का कहना है कि उसके पास सभी आवश्यक दस्तावेज मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद उसकी समस्या का समाधान नहीं किया जा रहा है.

वीडियो में देखा जा सकता है कि व्यक्ति अधिकारियों से मिलने की कोशिश कर रहा है और अपनी समस्या बताने का प्रयास कर रहा है. हालांकि बताया जा रहा है कि उसके पास अधिकारियों से मिलने के लिए आवश्यक पर्ची नहीं थी, जिसके कारण उसे मिलने की अनुमति नहीं मिल सकी. इसी बात को लेकर वहां मौजूद कर्मचारियों और मजदूर के बीच बहस शुरू हो गई. बहस बढ़ने के बाद मजदूर का गुस्सा और बेबसी दोनों सामने आ गए और वह जोर-जोर से अपनी समस्या बताने लगा.

मजदूर ने दावा किया कि उसका नाम विशेष पुनरीक्षण सूची से हटा दिया गया है और इस संबंध में उसने कई बार बूथ लेवल अधिकारी से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला. उसने यह भी कहा कि उसके पिता का निधन हो चुका है और उसकी मां की आंखों की रोशनी भी कमजोर है, जिससे परिवार की जिम्मेदारी पूरी तरह उसी पर है. मजदूर ने बताया कि वह रोजाना मजदूरी करके परिवार का पालन-पोषण करता है और बार-बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाना उसके लिए संभव नहीं है.

वीडियो में मजदूर अपनी मां के साथ खड़ा दिखाई देता है और भावुक होकर कहता है कि उसके पास समय और संसाधनों की कमी है, इसलिए वह लगातार कार्यालयों के चक्कर नहीं लगा सकता. उसने अधिकारियों पर आरोप लगाया कि वे उसकी समस्या सुनने के लिए तैयार नहीं हैं. मजदूर ने कहा कि उसने सभी जरूरी दस्तावेज जमा करने की कोशिश की है, लेकिन फिर भी उसकी समस्या का समाधान नहीं किया गया है.

जनसुनवाई के दौरान वहां मौजूद लोगों ने पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा कर दिया, जिसके बाद यह मामला तेजी से वायरल हो गया. वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं. कई लोगों ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि गरीब और मजदूर वर्ग के लोगों के लिए सरकारी व्यवस्थाएं अक्सर जटिल और मुश्किल साबित होती हैं. वहीं कुछ लोगों ने यह भी कहा कि मतदाता सूची में नाम हटना गंभीर मामला है और प्रशासन को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता दिखानी चाहिए.

इस घटना ने विशेष पुनरीक्षण अभियान को लेकर भी चर्चा तेज कर दी है. चुनाव प्रक्रिया में मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए समय-समय पर विशेष अभियान चलाए जाते हैं, जिसमें मृत व्यक्तियों के नाम हटाने, नए मतदाताओं को जोड़ने और त्रुटियों को सुधारने का कार्य किया जाता है. हालांकि कई बार इन प्रक्रियाओं के दौरान तकनीकी या प्रशासनिक कारणों से पात्र लोगों के नाम भी सूची से हट जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं.

मामले को लेकर अब तक जिला प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है. सूत्रों के अनुसार प्रशासन इस वीडियो में दिखाई देने वाले व्यक्ति की पहचान करने और उसकी शिकायत की जांच करने का प्रयास कर रहा है. प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से हट गया है तो उसे निर्धारित प्रक्रिया के तहत दोबारा जोड़ा जा सकता है.

विशेषज्ञों का कहना है कि मतदाता सूची से नाम हटना केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर विषय है. संविधान प्रत्येक नागरिक को मतदान का अधिकार देता है और यदि किसी पात्र व्यक्ति का नाम सूची से हट जाता है तो वह अपने इस अधिकार का उपयोग नहीं कर पाता. ऐसे मामलों में त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई आवश्यक मानी जाती है.

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो ने आम लोगों की समस्याओं को भी उजागर किया है. कई यूजर्स ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकारी प्रक्रियाएं गरीब और अशिक्षित लोगों के लिए समझना और पूरा करना कठिन होता है. उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि जनसुनवाई और शिकायत निवारण की प्रक्रिया को और अधिक सरल और सुलभ बनाया जाए.

राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे वीडियो प्रशासन और सरकार के लिए चेतावनी का काम करते हैं. उनका कहना है कि डिजिटल और ऑनलाइन व्यवस्था लागू होने के बावजूद जमीनी स्तर पर कई लोगों को अभी भी सरकारी प्रक्रियाओं को समझने और पूरा करने में कठिनाई होती है. विशेष रूप से मजदूर और ग्रामीण वर्ग के लोगों को दस्तावेजी प्रक्रियाओं और औपचारिकताओं को पूरा करने में परेशानी का सामना करना पड़ता है.

इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर भी चर्चा शुरू हो गई है और कई सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मामले की जांच करने और मजदूर की समस्या का समाधान करने की मांग की है. लोगों का कहना है कि जनसुनवाई कार्यक्रम का उद्देश्य नागरिकों की समस्याओं को सुनना और उनका समाधान करना होता है, इसलिए ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और सहानुभूति जरूरी है.

फिलहाल प्रशासन द्वारा संबंधित व्यक्ति की तलाश की जा रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि उसका नाम किन कारणों से मतदाता सूची से हटाया गया. यदि जांच में यह पाया जाता है कि नाम गलती से हटाया गया है तो उसे दोबारा सूची में जोड़ने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है. वहीं यह घटना प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली और आम नागरिकों तक उसकी पहुंच को लेकर नई बहस को जन्म देती नजर आ रही है.

यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सरकारी शिकायत निवारण प्रणाली वास्तव में समाज के कमजोर और गरीब वर्ग तक प्रभावी तरीके से पहुंच पा रही है या नहीं. वायरल वीडियो ने जहां एक मजदूर की बेबसी को सामने रखा है, वहीं प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही और संवेदनशीलता को लेकर व्यापक चर्चा भी शुरू कर दी है.

संवाददाता :- आशीष सोनी