क्या होती है गुड़ी..? क्यों की जाती है स्थापना, जानिए तेल स्नान से कैसे मिलती है मां लक्ष्मी की कृपा...



चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गुड़ी पड़वा का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व 19 मार्च, गुरुवार को मनाया जाएगा। इसी दिन से हिंदू कैलेंडर नवसंवत्सर 2083 की शुरुआत होगी। चैत्र नवरात्रि का भी आरंभ होगा. धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की थी. इसलिए इस तिथि को हिंदू नववर्ष के रूप में मनाया जाता है. महाराष्ट्र में इसे गुड़ी पड़वा, कर्नाटक में युगादी और आंध्र प्रदेश-तेलंगाना में उगादी कहा जाता है।

गुड़ी पड़वा की तिथि और समय:

वर्ष 2026 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 19 मार्च सुबह 6:52 बजे से शुरू होकर 20 मार्च सुबह 4:52 बजे तक रहेगी. इसी दिन से मराठी शक संवत 1948 का आरंभ भी माना जाएगा।



गुड़ी स्थापित करने की परंपरा:

महाराष्ट्र में इस दिन घरों में गुड़ी स्थापित करने की विशेष परंपरा है। गुड़ी को विजय और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इसे घर के मुख्य द्वार, छत या किसी ऊंचे स्थान पर लगाया जाता है ताकि वह दूर से दिखाई दे सके. गुड़ी बनाने के लिए एक बांस पर सुंदर कपड़ा, आम और नीम की पत्तियां, फूल और ऊपर उल्टा चांदी, तांबे या पीतल का कलश लगाया जाता है। यह ध्वज शुभता और नए साल के स्वागत का प्रतीक माना जाता है।


तेल स्नान की परंपरा और महत्व:

गुड़ी पड़वा की सुबह जल्दी उठकर सुगंधित तेल से स्नान करने की परंपरा भी प्रचलित है. ऐसा करने से शरीर की अशुद्धियां दूर होती हैं, रक्त संचार बेहतर होता है और व्यक्ति पूरे उत्साह व सकारात्मकता के साथ नए वर्ष की शुरुआत करता है. साथ ही यह भी माना जाता है कि इस दिन तेल स्नान करने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।


पारंपरिक व्यंजन से होता है नए साल का स्वागत:

गुड़ी पड़वा के मौके पर महाराष्ट्र में श्रीखंड, पुरण पोली, राइस चकली और भाकरवड़ी जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं. परिवार और रिश्तेदारों के साथ इन पकवानों का आनंद लेते हुए लोग नए साल का स्वागत करते हैं।


- नोफ़िकर न्यूज़ मध्यप्रदेश