आस्था या अंधविश्वास? धर्म की आड़ में फलता-फूलता ढोंग का कारोबार




देश में धर्म और आस्था हमेशा से लोगों के जीवन का अहम हिस्सा रहे हैं लेकिन इसी आस्था के नाम पर एक ऐसा सच भी मौजूद है, जो समय-समय पर सामने आता रहता है तथाकथित बाबाओं और धर्मगुरुओं का बढ़ता प्रभाव समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी इन पर आंख बंद करके भरोसा करता है। इस भरोसे का फायदा उठाकर कुछ लोग इसे एक संगठित “कारोबार” में बदल चुके हैं। 

जमीनी स्तर पर देखा जाए तो ऐसे मामलों में अक्सर लोगों की व्यक्तिगत कमजोरियों जैसे बीमारी, आर्थिक संकट या पारिवारिक समस्याओं को निशाना बनाया जाता है।और लोगो का शोषण किया जाता हैं स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब पीड़ित सामने आने से कतराते हैं। सामाजिक दबाव, बदनामी का डर और आस्था से जुड़ा भावनात्मक लगाव उन्हें चुप रहने के लिए मजबूर करता है। यही कारण है कि कई बार ऐसे मामलों की सच्चाई लंबे समय तक सामने नहीं आ पाती।

पिछले कुछ वर्षों में देश में कई चर्चित घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि धर्म के नाम पर शोषण की यह प्रवृत्ति एक गंभीर सामाजिक चुनौती बन चुकी है।
गुरमीत राम रहीम सिंह और आसाराम बापू को यौन शोषण से जुड़े मामलों में अदालत द्वारा दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि नारायण साईं को भी इसी प्रकार के मामले में सजा सुनाई गई है।

वहीं, स्वामी नित्यानंद और वीरेंद्र देव दीक्षित से जुड़े मामलों में गंभीर आरोप सामने आए, जिनकी जांच एजेंसियों द्वारा जांच की गई और कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई। इसके अलावा दाती महाराज, फलाहारी बाबा और इच्छाधारी संत भिमानंद जैसे मामलों ने भी समय-समय पर सुर्खियां बटोरीं, जिनमें शोषण और धोखाधड़ी से जुड़े आरोप लगाए गए।

इन मामलों में शिकायतें दर्ज की गईं, जबकि कुछ घटनाओं में यौन शोषण जैसे आरोपों ने पूरे देश को झकझोर दिया।जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बाद कई तथाकथित बाबाओं की सच्चाई उजागर हुई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि आस्था की आड़ में किस तरह लोगों का शोषण किया जा रहा था।

यह समस्या केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित नहीं है बल्कि समाज की उस सोच से भी जुड़ी है जहां बिना पर्याप्त जानकारी या जांच के किसी पर अत्यधिक विश्वास कर लिया जाता है आवश्यक है कि लोग आस्था के साथ-साथ विवेक और जागरूकता को भी महत्व दें।

प्रभावशाली धर्मगुरुओं के लाखों अनुयायी होते हैं जिससे उनकी सामाजिक पकड़ और राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ जाता है विश्लेषकों का मानना है कि कुछ परिस्थितियों में विभिन्न राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा ऐसे प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ मंच साझा करना या समर्थन लेना भी देखा गया है जिससे उनका प्रभाव और व्यापक हो जाता है ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह समीकरण जवाबदेही को कमजोर करता है और क्या इसी वजह से कुछ मामलों में कार्रवाई की गति प्रभावित होती है?

संवाददाता :- आस्था विश्वकर्मा