राख नहीं, पहाड़ बनो: सती से शैलपुत्री तक का सफर
"पर क्या आप जानती हैं कि माँ शैलपुत्री बनने से पहले, वो 'सती' थीं? जिन्होंने अपमान सहा और खुद को भस्म कर लिया। पर पुनर्जन्म में उन्होंने तय किया—कि अब वो राख नहीं बनेंगी, वो खुद एक पहाड़ बनेंगी।"
"ठीक माँ शैलपुत्री जैसा ही एक 'पुनर्जन्म' हुआ साल 2011 में। एक लड़की—अरुणिमा सिन्हा। कुछ लुटेरों ने उसे चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया। पूरी रात वो पटरी पर पड़ी रही। एक पैर कट चुका था, हड्डियाँ चकनाचूर थीं।"
"49 ट्रेनें उस रात उसके कटे हुए पैर के ऊपर से गुजरीं। चूहे उसके शरीर को कुतर रहे थे। दुनिया कह रही थी—'बेचारी, अब इसका क्या होगा?' हर तरफ फिकर जताने वालों की भीड़ थी, पर रास्ता दिखाने वाला कोई नहीं।"
"लेकिन अरुणिमा ने अस्पताल के उस बेड पर, जहाँ लोग मौत मांगते हैं, वहाँ माउंट एवरेस्ट मांगा! उसने दुनिया की फिकर छोड़ दी। उसने खुद से कहा—'अगर मैं जिंदा हूँ, तो किसी बड़े मकसद के लिए हूँ।' नकली पैर के साथ वो उस शिखर पर चढ़ी, जहाँ सलामत लोग जाने से डरते हैं। वो रुकी नहीं, वो झुकी नहीं। वो आधुनिक युग की 'शैलपुत्री' बन गई।"
"तुम्हारी जिंदगी में भी मुश्किलें 'पहाड़' बनकर खड़ी होंगी। लोग फिकर जताएंगे, पर लड़ना तुम्हें खुद है। इस नवरात्रि, सिर्फ दीया मत जलाओ, अपने अंदर की उस 'शैलपुत्री' को जगाओ जो गिरकर और भी ऊँचा उठना जानती है।"
"डर छोड़ो, खुद को पहचानो। क्योंकि तुम खुद एक शक्ति हो।
"अगर आप भी अपनी लाइफ के पहाड़ को फतह करना चाहती हैं, तो कमेंट्स में 'जय माता दी' लिखिये और इस लेख को हर उस 'शैलपुत्री' के साथ शेयर कीजिये जिसे आज इस हिम्मत की ज़रूरत है।
संवाददाता :- मोनिका शर्मा

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