सिंगरौली से सीधी तक दलाल, सरकारी तंत्र की सांठगांठ, चेकपोस्ट बने कमाई के अड्डे
मध्यप्रदेश में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी को लेकर एक बार फिर बड़ा घोटाला सामने आ रहा है। सीमावर्ती उत्तर प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ से बड़े पैमाने पर धान लाकर जिले के कई कथित सेवा सहकारी समितियों के खरीदी केन्द्रों में खपाई की जा रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि यूपी छत्तीसगढ़ की सड़ी-गली और घटिया गुणवत्ता वाली धान को मध्यप्रदेश की बताकर समर्थन मूल्य पर खरीदा जा रहा है, जिससे शासन को करोड़ों रुपये का सीधा नुकसान हो रहा है।
सूत्रों के अनुसार यूपी के सोनभद्र जिले के दुद्धि, भरहरी, गोभा, माड़ा क्षेत्र, झरकटा समेत अन्य मार्गो से रोजाना दर्जनों पीकअप और ट्रैक्टर-ट्रॉली धान लेकर एमपी की सीमा में प्रवेश कर रही हैं। यह धान सीधे जिले में प्रवेश होते हुए सीधी और सिंगरौली की कथित समितियों तक पहुंच रही है। कागजों में यह धान एमपी के किसानों की बताई जाती है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि हकीकत में यह पूरा खेल सीमावर्ती माफिया और दलालों द्वारा संचालित है। सीमा पर बने चेक पोस्टों की भूमिका भी पूरी तरह संदिग्ध है। आरोप है कि हर वाहन से 1000 प्रति वाहन की अवैध वसूली कर धान को बिना रोक-टोक अंदर आने दिया जा रहा है। इसके बाद जब यह धान समितियों तक पहुंचती है, वहीं रास्ते में संबंधित पुलिस चौकियों द्वारा 4 हजार एवं थानों की पुलिस द्वारा 6000 प्रति गाड़ी तक की उगाही की जा रही है। यानी किसान नहीं, बल्कि सिस्टम ही इस अवैध कारोबार का संरक्षक बना हुआ है। धान खरीदी केंद्रों पर हालात और भी गंभीर हैं। कई समितियों में दलाल खुलेआम सक्रिय हैं, जो यूपी और छत्तीसगढ़ की धान को एमपी के किसानों के नाम पर दर्ज करा रहे हैं। वास्तविक स्थानीय किसान घंटों लाइन में खड़े रहते हैं, लेकिन उनकी धान तौलने से पहले ही बाहरी धान अंदर खपा दी जाती है। गुणवत्ता जांच केवल कागजों तक सीमित है, न नमी की सही जांच, न सड़न की, न ही भौतिक सत्यापन। फिलहाल कथित समिति घोघरा, गढ़वा के पड़री, कुसाही, धरौली समेत अन्य खरीदी केन्द्रों में सक्रिय दलालों एवं चल रहे अवैध वसूली को लेकर प्रशासन पर भी उंगली उठने लगी है।
चेकपोस्टो पर सीसीटीव्ही कैमरा लगाने की मांग
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसके इशारे पर यह पूरा नेटवर्क चल रहा है, क्या चेक पोस्टों पर तैनात अधिकारी अनजान हैं या जानबूझकर आंख मूंदे हुए हैं, क्या समितियों के कथित प्रबंधक और कर्मचारी बिना ऊपर के दबाव के इतना बड़ा खेल कर सकते है। यदि समय रहते इस मामले की उच्च स्तरीय जांच नहीं हुई और दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो यह धान घोटाला आने वाले समय में प्रदेश की कृषि नीति और समर्थन मूल्य व्यवस्था को पूरी तरह खोखला कर देगा। अब निगाहें शासन और प्रशासन पर टिकी हैं, क्या कार्रवाई होगी, या फिर यूपी और छत्तीसगढ़ की धान यूं ही एमपी में बिकती रहेगी और सरकारी खजाना लुटता रहेगा। अब प्रबुद्ध नागरिक इसी बात को लेकर कलेक्टर का ध्यान आकृष्ट कराते हुये चेक पोस्टो पर सीसीटीव्ही कैमरा लगाए जाने की मांग की है।
मैदानी अधिकारी अनजान या फिर संरक्षण
स्थानीय किसानों का आरोप है कि यदि वे इस गोरखधंधे का विरोध करते हैं, तो उन्हें धमकाया जाता है या उनकी धान रिजेक्ट कर दी जाती है। कई किसानों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह खेल सरकारी तंत्र संरक्षण के बिना संभव ही नहीं है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब रोजाना सैकड़ों वाहन सीमावर्ती रास्तों से धान लेकर आ रहे हैं, तो क्या राजस्व, खाद्य विभाग और पुलिस को इसकी भनक तक नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एक वाहन में औसतन 70 से 80 क्विंटल धान लाई जा रही है और रोजाना दर्जनों वाहन प्रवेश कर रहे हैं, तो यह आंकड़ा हजारों क्विंटल प्रतिदिन तक पहुंचता है। इस तरह पूरे खरीदी सीजन में शासन को दर्जनों करोड़ रुपये का नुकसान होना तय है। यह सिर्फ आर्थिक घोटाला नहीं, बल्कि ईमानदार किसानों के हक पर सीधा डाका है और स्लॉट में भी खेला है।
संवाददाता :- आशीष सोनी

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