मंत्री का भूमि पूजन, दबंगों की लूट और पुलिस की चुप्पी
काम शून्य, भुगतान पूरा—₹2.53 लाख सीधे दबंगों के खाते में
सरपंच ग्राम पंचायत शेरवा जनपद पंचायत चितरंगी क़े बहादुर बासोर का आरोप है कि पीसीसी सड़क निर्माण के लिए स्वीकृत ₹2,53,400 की पूरी राशि एक ईंट रखे बिना निकाल ली गई। पैसा गया भूपेंद्र कुमार दुर्वेदी, सुजीत दुर्वेदी और सुनील दुर्वेदी (पिता—अवधेश दुर्वेदी, पूर्व सरपंच) के खातों में।
न सड़क बनी, न मजदूर लगे, न सामग्री आई, लेकिन सरकारी खजाना साफ सचिव ‘हाईजैक’, पंचायत रिमोट से चल रही
सरपंच का सीधा आरोप है कि पंचायत सचिव कल्पना सिंह पूरी तरह दबंगों के कब्जे में हैं। पंचायत की फाइलें, भुगतान और निर्णय सरपंच नहीं, पूर्व सरपंच के बेटे तय कर रहे हैं। जो सवाल उठाए, उसे धमकी—जो बोले, उसे दबाव।
पहले भी घोटाले, अब खुला आतंक
आरोप है कि यही लोग पहले भी पंचायत में घोटाले कर चुके हैं, लेकिन कार्रवाई शून्य रही। नतीजा—अब ये खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं और वर्तमान सरपंच को भी गलत काम में शामिल होने का दबाव बना रहे हैं।
बेटे को कुचलने की कोशिश—फिर भी FIR नहीं
मामला तब फट पड़ा जब सरपंच ने आरोप लगाया कि उनके बेटे पर गाड़ी चढ़ाकर हत्या की कोशिश की गई। शिकायत चितरंगी थाना में दी गई, लेकिन थाना प्रभारी सुधेश तिवारी ने आज तक FIR दर्ज नहीं की।
सवाल साफ है—
क्या दबंग कानून से ऊपर हैं?
क्या दलित सरपंच की जान की कोई कीमत नहीं?
या फिर संरक्षण ऊपर तक फैला है?
दलित सरपंच को डराने-कुचलने की साजिश
बहादुर बासोर का कहना है कि यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि दलित निर्वाचित प्रतिनिधि को कुचलने की साजिश है। जब उसने लूट के खिलाफ आवाज उठाई, तो उसे धमकाया गया, परिवार पर हमला हुआ और अब पुलिस भी साथ नहीं दे रही।
मंत्री के भूमि पूजन पर भी बट्टा
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राज्यमंत्री खुद भूमि पूजन कर चुकी हैं, तब भी अगर सड़क नहीं बनी और पैसा लूट लिया गया, तो
पंचायती राज व्यवस्था किसके भरोसे है
सरकार की जवाबदेही कौन तय करेगा
प्रशासन कटघरे में
पैसा बिना काम कैसे निकला?
सचिव पर कार्रवाई क्यों नहीं?
जानलेवा हमले की FIR क्यों नहीं?
इन सवालों के जवाब अब सिर्फ पंचायत नहीं, कलेक्टर, एसपी और सरकार को देने होंगे।
सरपंच की चेतावनी
सरपंच बहादुर बासोर ने साफ कहा है—
यदि जल्द
उच्चस्तरीय जांच,
राशि की वसूली,
दबंगों की गिरफ्तारी,
और पुलिस सुरक्षा
नहीं मिली, तो वे मामले को जिले से प्रदेश तक ले जाएंगे।
अब यह सिर्फ एक सड़क का मामला नहीं रहा—
यह दलित स्वाभिमान, पंचायत लोकतंत्र और कानून की साख की लड़ाई बन चुका है
संवाददाता :- आशीष सोनी

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