देर रात तक बजते डीजे के शोर ने छीनी जनता की नींद, प्रशासन की चुप्पी पर नागरिकों का आक्रोश


मध्य प्रदेश की न्यायिक राजधानी और सांस्कृतिक केंद्र कहा जाने वाला जबलपुर शहर इन दिनों एक ऐसी गूँज से परेशान है जो न केवल कानों को चुभ रही है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी छिन्न-भिन्न कर रही है. शहर के लगभग हर कोने से आ रही तेज डीजे और लाउडस्पीकर के शोर की शिकायतों ने अब एक बड़े जन-आक्रोश का रूप ले लिया है. विशेषकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर पिछले चौबीस घंटों में जबलपुर के नागरिकों ने अपनी पीड़ा को जिस तरह शब्दों में पिरोया है, उसने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

विवाद की मुख्य वजह शहर में आयोजित होने वाले वे अनगिनत धार्मिक और सामाजिक जलसे हैं, जिनमें नियमों को ताक पर रखकर पूरी रात ऊँची आवाज में संगीत बजाया जा रहा है. स्थानीय निवासियों का आरोप है कि उत्सवों की आड़ में अब मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखा लांघी जा रही है और शहर की शांति को बंधक बना लिया गया है.

यदि इस स्थिति का विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल शोर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम आदमी के स्वास्थ्य और मौलिक अधिकारों पर हमला है. रेडिट पर वायरल हो रहे एक बेहद भावुक पोस्ट में एक वरिष्ठ नागरिक ने अपना दर्द साझा करते हुए लिखा है कि तेज बेस (bass) वाले संगीत के कारण उनके घर की खिड़कियाँ तक थरथराती हैं, जिससे उनके दिल की धड़कनें अनियंत्रित हो जाती हैं.

इसी तरह, परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों का कहना है कि वे अपने ही घर के भीतर एकाग्रता नहीं बना पा रहे हैं क्योंकि बाहर का शोर दीवारों को भेदकर अंदर तक पहुँच रहा है. विडंबना यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट दिशा-निर्देश मौजूद हैं कि रात 10:00 बजे के बाद किसी भी प्रकार का शोर करने वाले यंत्र का उपयोग प्रतिबंधित है, फिर भी जबलपुर की सड़कों पर रात के सन्नाटे को चीरती ये आवाजें बेखौफ सुनाई दे रही हैं.

जनता के बीच इस समय सबसे बड़ी मांग प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी को लेकर है. लोगों का कहना है कि जब भी पुलिस कंट्रोल रूम या संबंधित थानों में फोन किया जाता है, तो या तो आश्वासन देकर मामले को टाल दिया जाता है या फिर पुलिस के आने के कुछ मिनटों बाद ही शोर दोबारा शुरू हो जाता है. नागरिकों ने अब सीधे तौर पर प्रशासन से मांग की है कि केवल समझाइश देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अब समय आ गया है कि इन भारी-भरकम डीजे मशीनों को मौके पर ही जब्त किया जाए और संबंधित आयोजकों के साथ-साथ उपकरण मालिकों पर भी आपराधिक मामले दर्ज किए जाएं. सोशल मीडिया पर चल रही यह मुहिम अब एक डिजिटल आंदोलन का रूप ले चुकी है, जहाँ लोग अपने-अपने क्षेत्रों के शोर के वीडियो रिकॉर्ड कर उच्च अधिकारियों को टैग कर रहे हैं.

समाज के बुद्धिजीवी वर्ग का मानना है कि आस्था और उल्लास कभी भी दूसरों की परेशानी का कारण नहीं बनने चाहिए. जबलपुर जैसे शहर में जहाँ हर त्योहार को बड़ी आत्मीयता से मनाया जाता है, वहाँ इस तरह का ध्वनि प्रदूषण आपसी भाईचारे में भी कड़वाहट पैदा कर रहा है. यदि समय रहते जिला प्रशासन और पुलिस विभाग ने इन अवैध रूप से बजने वाले डीजे पर नकेल नहीं कसी, तो शहर के निवासियों का यह मानसिक तनाव किसी बड़े नागरिक विरोध में बदल सकता है. फिलहाल, जबलपुर की रातें सुकून की तलाश में हैं और यहाँ का हर जागरूक नागरिक बस यही सवाल पूछ रहा है कि क्या संस्कारधानी की शांति कभी वापस लौट पाएगी या फिर विकास की इस दौड़ में शोर ही हमारी नियति बन जाएगा.


संवाददाता :- आशीष सोनी