चितरंगी कस्तूरबा छात्रावास मामला सत्ता के खौफ में कुचले नियम, वर्षो बाद भी शासनादेश बेअसर


सिंगरौली जिले के चितरंगी स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास का वार्डन परिवर्तन मामला अब केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सत्ता के दबाव में नियमों की खुले आम हत्या का प्रतीक बन चुका है। संविधान जहां समानता और पारदर्शिता की बात करता है, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि यहां शासन के आदेश सत्ता के प्रभाव के आगे बेबस नजर आ रहे हैं।

शासन देश बना कागज का टुकड़ा-

राज्य शिक्षा केंद्र ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाली सभी वार्डनों को 30 जून 2025 तक हटाना और वार्डन परिवर्तन अनिवार्य होगा। लेकिन चितरंगी छात्रावास में तैनात वार्डन सविता सिंह आज भी उसी पद पर काबिज हैं। यह महज देरी नहीं, बल्कि शासन के लिखित आदेशों की खुली अवहेलना है—और वह भी ऐसे समय में जब अन्य छात्रावासों में नियमों का पालन कर वार्डनों को हटाया जा चुका है।

जहां नियम खत्म, वहां प्रभाव शुरू -

जिले के बाकी कस्तूरबा एवं नेताजी सुभाष चंद्र बोस छात्रावासों में नियम लागू हो गए, लेकिन चितरंगी आते-आते वही नियम दम तोड़ देते हैं। आखिर क्यों? स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि संबंधित वार्डन का एक प्रभावशाली राज्य मंत्री से पारिवारिक संबंध है। यही “संबंध” अब नियमों से ऊपर दिखाई दे रहा है।

प्रशासन की चुप्पी—सबसे बड़ा सवाल -

जिला परियोजना समन्वयक (KGBV), जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारी—सभी इस पूरे मामले पर चुप हैं। राज्य शिक्षा केंद्र और संबंधित प्रभारी से संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन फोन तक नहीं उठाया गया। यह चुप्पी अब संयोग नहीं, बल्कि मिलीभगत की ओर इशारा कर रही है।

भर्ती से बजट तक—हर स्तर पर सवाल -

मामला यहीं नहीं रुकता लग रहे अन्य आरोप और भी गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। 31 अगस्त 2025 को नियमों के खिलाफ पुनर्नियुक्तियां। बिना विज्ञापन पुराने वार्डनों की वापसी। प्रति नियुक्ति ₹1.50 लाख तक लेन-देन की चर्चाएं, ₹227 करोड़ के बजट के बावजूद भोजन की खराब गुणवत्ता, प्रति छात्रावास ₹22.25 लाख मासिक वसूली के आरोप। निरीक्षण तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह कोई साधारण अनियमितता नहीं, बल्कि संगठित भ्रष्ट तंत्र का बू आना लाजिम है।

बेटियों के भविष्य से खिलवाड़ -

कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास योजना समाज के सबसे वंचित, आदिवासी और ग्रामीण वर्ग की बेटियों के लिए चलाई जाती है। लेकिन जब इसी योजना में सत्ता संरक्षण के चलते नियमों की धज्जियां उड़ाई जाएं, तो इसका सीधा असर उन मासूम छात्राओं के भविष्य पर पड़ता है।

अब जवाब देना ही होगा -

 वर्षों बीत चुके हैं— न वार्डन परिवर्तन हुआ, न जांच शुरू हुई, न किसी अधिकारी ने जवाब दिया, अब सवाल सीधे सरकार और जिला प्रशासन से है- क्या शासनादेश केवल कमजोरों पर लागू होते हैं ? क्या सत्ता से जुड़े लोगों के लिए नियम बदल जाते हैं ? चितरंगी छात्रावास में कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई ?

लोकतंत्र बनाम प्रभाव -

लोकतंत्र आदेशों और कानून से चलता है, न कि रिश्तों और दबाव से। यदि चितरंगी जैसे मामलों में भी शासन मौन रहता है, तो यह सिर्फ एक छात्रावास नहीं, पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल है। अब कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला लापरवाही नहीं—सत्ता संरक्षण में पनपता खुला भ्रष्टाचार माना जाएगा।

संवाददाता :- आशीष सोनी