सिंगरौली-जहां एक ओर बडकुड़ ग्राम पंचायत में संचालित खनन और स्टोन क्रशर परियोजना को विकास और रोजगार का प्रतीक बताया जा रहा है, वहीं जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलटा तस्वीर पेश कर रही है। क्षेत्र में बढ़ती खनन गतिविधियों ने अब ग्रामीणों के जीवन, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर खतरे खड़े कर दिए हैं।
धूल और प्रदूषण से घुट रही सांसें
खनन और क्रशर से निकलने वाली महीन धूल ने पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया है। घरों की छतों, पेड़ों और खेतों पर जमी धूल अब ग्रामीणों की सांसों में समा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि लगातार उड़ती धूल के कारण दमा, खांसी और आंखों में जलन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है।
ध्वनि प्रदूषण से टूट रहा सुकून
दिन-रात चलने वाले भारी मशीनों और ट्रकों की आवाज ने गांव की शांति छीन ली है। तेज धमाकों और मशीनों की कर्कश ध्वनि से न सिर्फ लोगों की नींद प्रभावित हो रही है, बल्कि मानसिक तनाव भी बढ़ता जा रहा है। स्कूल जाने वाले बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित हो रही है।
कृषि और जल स्रोतों पर संकट
खनन के कारण आसपास के खेतों की उर्वरता घट रही है। धूल की परत फसलों को नुकसान पहुंचा रही है, जिससे उत्पादन में गिरावट देखी जा रही है। साथ ही, भूजल स्तर में गिरावट और जल स्रोतों के दूषित होने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं, जो आने वाले समय में गंभीर जल संकट का संकेत है।
सड़कें बनीं खतरे का रास्ता
ओवरलोड ट्रकों की लगातार आवाजाही से गांव की सड़कें जर्जर हो चुकी हैं। सूत्र बताते हैं बिना टीपी तेज रफ्तार वाहनों से दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार छोटे बच्चे और पशु इन भारी वाहनों की चपेट में आने से बाल-बाल बचे हैं।
नियमों का पालन या सिर्फ कागजी दावा
हालांकि प्रबंधन द्वारा सुरक्षा और नियमों के पालन के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका असर नजर नहीं आता। प्रदूषण नियंत्रण के उपाय जैसे पानी का छिड़काव, ग्रीन बेल्ट और ध्वनि नियंत्रण की व्यवस्था या तो नाकाफी है या पूरी तरह से नजरअंदाज की जा रही है।
ग्रामीणों में आक्रोश, कार्रवाई की मांग
स्थानीय लोगों में अब आक्रोश बढ़ता जा रहा है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि खनन और क्रशर गतिविधियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए और पर्यावरणीय मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
बडकुड़ में खनन परियोजना को विकास का मॉडल बताना तब तक अधूरा है, जब तक यह लोगों के स्वास्थ्य, पर्यावरण और जीवन की कीमत पर चलती रहे। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह “विकास” आने वाले समय में एक बड़े संकट में बदल सकता है।
संवाददाता:–आशीष सोनी

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