मुख्यमंत्री कार्यक्रम में हंगामा महापौर-टीआई के बीच नोकझोंक का वीडियो आया सामने 




मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में एक राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव का मामला सामने आया है, जिसने स्थानीय राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दौरे के दौरान मुरैना की महापौर शारदा सोलंकी और एक महिला थाना प्रभारी के बीच हुई तीखी बहस का वीडियो सामने आने के बाद यह मामला और अधिक सुर्खियों में आ गया है। यह पूरा घटनाक्रम उस समय हुआ जब मुख्यमंत्री एक निजी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जिले के वरिष्ठ नेता और कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना के निवास पर पहुंचे थे। कार्यक्रम एक नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देने के लिए आयोजित किया गया था, लेकिन इसी दौरान प्रोटोकॉल और प्रवेश व्यवस्था को लेकर विवाद खड़ा हो गया।

क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार, सोमवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मुरैना पहुंचे थे, जहां उन्होंने कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना के निवास पर आयोजित एक पारिवारिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम मंत्री के घर की दूसरी मंजिल पर आयोजित किया गया था, जहां सीमित लोगों को ही प्रवेश दिया जा रहा था। इसी दौरान मुरैना की महापौर शारदा सोलंकी भी मुख्यमंत्री से मिलने के उद्देश्य से कार्यक्रम स्थल पर पहुंचीं। जब वे सीढ़ियों के माध्यम से ऊपर जाने लगीं, तो वहां तैनात सबलगढ़ थाना प्रभारी राजकुमारी परमार ने उन्हें रोक दिया।

सीढ़ियों पर टकराव: ‘यह घर मेरा भी है’

महापौर को रोके जाने के बाद स्थिति अचानक तनावपूर्ण हो गई। बताया जा रहा है कि थाना प्रभारी ने स्पष्ट रूप से कहा कि ऊपर केवल घर के सदस्य या अधिकृत लोग ही जा सकते हैं। इस पर महापौर शारदा सोलंकी नाराज हो गईं और उन्होंने कहा कि “यह घर मेरा भी है।” 

महापौर का कहना था कि उनका मंत्री परिवार से पुराना पारिवारिक संबंध है और मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति स्वाभाविक और प्रोटोकॉल के अनुरूप है। इसके बावजूद उन्हें रोके जाने से वे आक्रोशित हो गईं। कुछ समय तक दोनों पक्षों के बीच बहस चलती रही और महापौर को सीढ़ियों पर ही इंतजार करना पड़ा। इस दौरान मौके पर मौजूद अन्य लोग भी इस स्थिति को देखते रहे, जिससे माहौल और अधिक असहज हो गया।

नेताओं के हस्तक्षेप के बाद मिली एंट्री

करीब कुछ समय तक चले इस विवाद के बाद, अन्य राजनीतिक नेताओं और मौजूद वरिष्ठ लोगों ने हस्तक्षेप किया। उनके समझाने के बाद अंततः महापौर को ऊपर जाने की अनुमति दी गई। हालांकि, अंदर जाने से पहले ही महापौर का गुस्सा साफ नजर आ रहा था। जाते समय उन्होंने थाना प्रभारी से नाराजगी जताते हुए कथित तौर पर कहा—“मजाक बना रखा है, एक घंटे से खड़ी हूं, बदतमीज कहीं की।” इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद यह मामला तेजी से चर्चा में आ गया।

महापौर का पक्ष: ‘मुझे जानबूझकर रोका गया’

घटना के बाद महापौर शारदा सोलंकी ने मीडिया से बातचीत में अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा: “मैं नगर की प्रथम नागरिक हूं और एक वरिष्ठ जनप्रतिनिधि हूं। मेरे और मंत्री जी के परिवार के बीच दो पीढ़ियों से संबंध हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में मेरा वहां होना स्वाभाविक था।”

उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें जानबूझकर रोका गया, जबकि अन्य लोगों को बिना किसी रोक-टोक के अंदर जाने दिया जा रहा था। “अगर किसी को भी अंदर नहीं जाने दिया जाता, तो मैं भी रुक जाती। लेकिन मेरे सामने ही अन्य लोग जा रहे थे और मुझे कहा गया कि ‘आप नहीं जाओगी’। यह पूरी तरह गलत है।” महापौर ने यह भी कहा कि थाना प्रभारी का व्यवहार उनके प्रति सम्मानजनक नहीं था और उन्होंने बदतमीजी से बात की।

शिकायत की तैयारी: पार्टी फोरम तक पहुंचेगा मामला

महापौर ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि वे इसकी शिकायत पार्टी फोरम तक करेंगी। उनका मानना है कि एक जनप्रतिनिधि के साथ इस तरह का व्यवहार उचित नहीं है और इस पर कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने इस संबंध में कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना से भी शिकायत की है।

थाना प्रभारी का जवाब: ‘मैंने सिर्फ ड्यूटी निभाई’

दूसरी ओर, इस मामले में थाना प्रभारी राजकुमारी परमार ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि उन्होंने किसी के साथ कोई अभद्रता नहीं की और केवल अपनी ड्यूटी का पालन किया। “मुझे जो निर्देश दिए गए थे, उसी के अनुसार मैंने प्रवेश नियंत्रित किया। किसी से बहस या बदतमीजी करने का सवाल ही नहीं उठता।” उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री का दौरा बहुत सीमित समय के लिए था और सुरक्षा के लिहाज से केवल चुनिंदा लोगों को ही प्रवेश दिया जा रहा था।

प्रोटोकॉल बनाम जनप्रतिनिधि सम्मान

यह पूरा मामला एक बड़े सवाल को जन्म देता है—क्या सुरक्षा प्रोटोकॉल के नाम पर जनप्रतिनिधियों को रोका जा सकता है? और यदि हां, तो क्या इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और समन्वय मौजूद है? एक ओर जहां सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह आवश्यक होता है कि वे वीआईपी मूवमेंट के दौरान कड़े प्रोटोकॉल का पालन करें, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों की गरिमा और उनके अधिकारों का भी ध्यान रखना जरूरी होता है इस घटना ने इन दोनों के बीच संतुलन की आवश्यकता को उजागर किया है।

वीडियो वायरल, सियासी हलचल तेज

घटना का वीडियो सामने आने के बाद यह मामला सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तेजी से चर्चा का विषय बन गया है। लोग इस पर अपनी-अपनी राय दे रहे हैं—कुछ महापौर के समर्थन में हैं, तो कुछ पुलिस की कार्रवाई को उचित ठहरा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय की कमी को दर्शाती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि जमीनी स्तर पर प्रोटोकॉल को लेकर स्पष्टता की जरूरत है।

प्रशासन और राजनीति के बीच तालमेल की जरूरत

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बड़े आयोजनों और वीआईपी कार्यक्रमों के दौरान प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय होना बेहद जरूरी है। यदि पहले से स्पष्ट सूची और दिशा-निर्देश तय कर दिए जाएं, तो इस तरह की असहज स्थितियों से बचा जा सकता है।

संवाददाता : किशोर कुशवाहा