आरकेएस कंस्ट्रक्शन के चेयरमैन रामकृपाल सिंह के निधन पर शोक


सिंगरौली आरकेएस कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के चेयरमैन रामकृपाल सिंह का पटना के पारस हास्पिटल में रविवार की सुबह 6 बजे निधन हो गया। वे करीब 90 वर्ष के थे। स्वास्थ्य खराब होने पर पटना के एक हास्पिटल में उनका 18 दिन से इलाज चल रहा था। उनका अंतिम संस्कार गृह ग्राम बेगूसराय जिले के रामदीरी में किया गया। वे अपने पीछे वे दो पुत्र सुधीर कुमार सिंह एवं रंजन सिंह व पुत्री मुन्नी देवी के साथ भरा पुरा परिवार छोड़ गये है। कंपनी के चेयरमैन राम कृपाल सिंह के निधन पर एनसीएल दुधीचुआ ओबी कैंप में शोक सभा आयोजित कर उन्हे श्रद्वांजली दी गयी। दिवंगत आत्मा की शांति व इस दुःख की घड़ी परिवार जनो को सबल प्रदान करने दो मिनट का मौन रखकर ईश्चर से प्रार्थना की गई। शोक सभा में बिनय कुमार सिंह, राजेश कुमार साही, रंजीत सिंह, विजय भान सिंह, जीतेन्द्र शर्मा, उदय बीर सिंह, राहुल सिंह, श्याम, मधू, बप्पी सहित कंपनी के सैकड़ो कर्मचारियों ने श्रद्वा सुमन अर्पित कर श्रद्वांजली दी। 

नही रहे रामदीरी के पुत्र

आरकेएस कंस्ट्रक्शन के संस्थापक एवं मालिक बेगूसराय जिले के रामदीरी, राम नगर टोला जैसे साधारण ग्रामीण परिवेश में जन्मे राम कृपाल सिंह का जीवन इस धारणा को पूरी तरह तोड़ देता है कि बिना शिक्षा और पूंजी के बड़ा सपना नहीं देखा जा सकता। उनके पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं, न कोई विरासत में मिला धन,न कोई बड़ा संरक्षण। फिर भी उन्होंने अपने छोटे भाई वेदा सिंह और पार्टनर शर्मा जी के साथ मिलकर त्ज्ञै कंस्ट्रक्शन की नींव रखी। शुरुआत हुई स्थानीय कार्यों से, फिर बरौनी रिफाइनरी जैसे बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स और जिले के प्रमुख सिविल कांट्रेक्टर के रूप में पहचान बनी। राम कृपाल सिंह की विरासत को आगे बढ़ाया उनके छोटे पुत्र रंजन सिंह (शिक्षा- इंटर तक) ने। अपने बड़े भाई सुधीर सिंह के साथ मिलकर उन्होंने फर्म को नई सोच, नई कार्यशैली और नए भूगोल तक पहुँचाया। बिहार से बाहर निकलकर झारखंड में सफलता के झंडे गाड़े, आज देश के कई हिस्सों में त्ज्ञै कंस्ट्रक्शन के प्रोजेक्ट्स सक्रिय हैं। परिणामस्वरूप, एक साधारण ठेकेदारी फर्म आज हजारों करोड़ के कारोबार वाली कंपनी बन चुकी है, और परिवार का नाम देश के अमीरों की सूची में 759वें स्थान तक पहुँच चुका है।

युवाओं के लिए सबसे बड़ा संदेश

राम कृपाल सिंह और उनके परिवार की यात्रा उन युवाओं के लिए सीधा संदेश है जो कहते हैं कि मेरे पास डिग्री नहीं है, मेरे पास पूंजी नहीं है,मेरे पास अवसर नहीं है, यह कहानी बताती है कि शिक्षा सहायक हो सकती है, पर अनिवार्य नहीं, पूंजी साधन है, पर संकल्प से बड़ी नहीं, और अवसर उन्हें मिलता है जो जोखिम उठाने का साहस रखते हैं। राम कृपाल सिंह केवल एक सफल उद्योगपति नहीं, बल्कि श्रम, धैर्य और पीढ़ीगत दृष्टि की जीवित मिसाल हैं। उनका जीवन कहता है कि रोने से नहीं, काम करने से इतिहास बनता है।

संवाददाता :- आशीष सोनी