सोनतीर अंचल में आवारा मवेशियों से अन्नदाताओं की बढ़ी परेशानियां, पंचायत से लेकर स्थानीय प्रशासन भी बेसूध


सिंगरौली जिले के जनपद पंचायत चितरंगी क्षेत्र के तराई अंचल अंतर्गत ग्राम पंचायत बरहट, खैरा, गांगी, फूलकेश, धरौली, बड़कुड़, पोड़ी समेत अन्य गांवों में आवारा मवेशियों का कहर अब किसानों की सहनशीलता की सीमा तोड़ चुका है। 

 बीते लगभग एक माह से डेढ़ से दो सैकड़ा आवारा मवेशी गांव और आसपास के खेतों में खुलेआम घूम रहे हैं और किसानों की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं। हालात यह हैं कि खड़ी फसलें मवेशियों का निवाला बन चुकी हैं, लेकिन जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और शासन- प्रशासन मूकदर्शक बने हुए हैं। गांव के किसानों का कहना है कि उन्होंने अपनी खून-पसीने की कमाई से बोवनी की, सिंचाई कर फसल खड़ी की, लेकिन अब आवारा मवेशी रात-दिन खेतों में घुसकर सब कुछ चट कर जा रहे हैं। गेहूं, चना, सरसों सहित अन्य रबी फसलें बर्बादी की कगार पर हैं। कई किसानों की तो पूरी फसल नष्ट हो चुकी है, जिससे उनके सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। किसानों का आरोप है कि उन्होंने कई बार ग्राम पंचायत के सरपंच से गुहार लगाई कि मवेशियों को पकड़कर गौशाला या किसी सुरक्षित स्थान पर रखा जाए, लेकिन सरपंच ने साफ तौर पर हाथ खड़े कर दिए। सरपंच का कहना है कि सरकार की ओर से कोई बजट नहीं मिल रहा, ऐसे में पंचायत आवारा मवेशियों की व्यवस्था कैसे करे। इस बयान ने किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है। वहीं ग्रामीणों का सवाल है कि जब सरकार गोवंश संरक्षण और गौशालाओं के नाम पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर रही हैं, तो जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था क्यों फेल हो रही है। 

अब कलेक्टर से करेंगे शिकायत  

किसानों का कहना है कि आखिर वे किससे मदद मांगे, क्या खेती करना छोड़ देना ही अब एकमात्र विकल्प बचा है। यह मामला सिर्फ बरहट ग्राम पंचायत का नहीं, बल्कि पूरे जिले और प्रदेश की उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, जहां योजनाएं कागजों में तो दमदार दिखती हैं, लेकिन जमीन पर किसान खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। अगर समय रहते पंचायत, जनपद और जिला प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह समस्या आने वाले दिनों में और विकराल रूप ले सकती है और इसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की होगी।

संवाददाता :- आशीष सोनी