सड़क की स्थिति जर्जर, कई जगह गड्ढे, आये दिन हो रहे हादसे, मालवाहको से वसूली जारी
इस मार्ग से गुजरने वाला हर वाहन चालक डर और मजबूरी के बीच सफर करने को विवश है। सबसे ज्यादा खतरा दोपहिया वाहन चालकों को है, जो आए दिन फिसलकर या गड्ढों में गिरकर दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं। कई लोग घायल होकर अस्पताल पहुंच चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों की संवेदनहीनता जस की तस बनी हुई है। इस सड़क के रखरखाव और मरम्मत की पूरी जिम्मेदारी उदित बरगवां-बैढ़न टोल प्लाजा को सौंपी गई है। एमपीआरडीसी के माध्यम से यहां कॉमर्शियल मालवाहकों वाहनों नियमित रूप से टोल वसूला जा रहा है। टोल प्लाजा पर न कोई रियायत है और न ही कोई ढील, लेकिन इसके बदले जनता को जो सुविधा मिलनी चाहिए, वह पूरी तरह गायब है। सवाल सीधा और गंभीर है कि जब सड़क इस कदर जर्जर हो चुकी है, तो टोल वसूली किस आधार पर और किस अधिकार से की जा रही है। क्या टोल अब केवल वसूली का जरिया बनकर रह गया है, जबकि सड़क मरम्मत कागजों में सिमट गई है। टोल अनुबंध की शर्तों के अनुसार संविदाकार को 25 किलोमीटर के दायरे में सड़क को दुरुस्त और सुरक्षित बनाए रखना अनिवार्य है। लेकिन मौजूदा हालात इन शर्तों का खुला उल्लंघन साबित हो रहे हैं। इस 25 किलोमीटर के सफर को तय करने में अब 45 मिनट या उससे भी अधिक समय लग रहा है। वाहन चालक गड्ढों से बचने के लिए बार-बार ब्रेक लगाने को मजबूर हैं। अधिकांश वाहन रास्ते में खराब भी हो जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण जगह-जगह टूटी सड़क मानी जा रही है। इसके बावजूद एमपीआरडीसी प्रबंधन मौन है।
सड़क की जर्जर हालत पर एमपीआरडीसी प्रबंधन मौन
सड़क की जर्जर हालत को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार आवाज उठाई जा रही है। लोग तस्वीरें और वीडियो साझा कर एमपीआरडीसी और टोल प्लाजा की लापरवाही उजागर कर रहे हैं, लेकिन अधिकारियों की नींद अब तक नहीं टूटी है। न तो मौके पर कोई निरीक्षण दिखाई देता है, न ही संविदाकार को नोटिस या दंड की खबर सामने आ रही है। इस चुप्पी ने जनता के बीच गहरे संदेह को जन्म दिया है। लोग खुलकर सवाल पूछ रहे हैं कि क्या यह महज लापरवाही है या फिर एमपीआरडीसी अधिकारियों की मौन सहमति से टोल प्लाजा मनमानी कर रहा है। हालांकि इस मार्ग से कलेक्टर समेत जनप्रतिनिधियों में सांसद, विधायक, यहां तक कि मंत्री का भी आना-जाना होता रहता है। इसके बावजूद जगह-जगह टूटी सड़क का मरम्मत कराने के लिए शायद किसी के द्वारा टोल प्लाजा संविदाकार पर दबाव नही बनाया जा रहा है।
एमपीआरडीसी का अमला टोल प्रबंधन पर मेहरवान
अब एमपीआरडीसी की पूरी कर प्रणाली और टोल प्रबंधन कठघर्रे में है। जब सड़क टूट चुकी है, हादसे हो रहे हैं और तय शर्तों का खुला उल्लंघन हो रहा है, तो टोल वसूली कैसे जायज ठहराई जा सकती है। दुर्घटना होने पर जिम्मेदारी किसकी होगी, एमपीआरडीसी की या टोल प्लाजा के संविदाकार की। जनता अब जवाब नहीं, कार्रवाई चाहती है। यदि जल्द ही सड़क की मरम्मत नहीं कराई गई और दोषियों पर सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह मुद्दा सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोग इसे एक अहम मुद्दा मानते हुये जोर-शोर से विरोध करेंगे। विरोध का स्वरूप कैसा होगा, यह भी अभी तय नही हो पाया है, लेकिन जगह-जगह टूटी सड़क के मरम्मत कार्य में बरती जा रही लापरवाही पर एमपीआरडीसी एवं संविदाकार की कार्यप्रणाली पर लोगबाग तरह-तरह के उंगली उठाने लगे हैं।
संवाददाता :- आशीष सोनी

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