मंचों की चमक में खो गया न्याय अस्थियां लेकर भटकता परिवार


दमोह जिले के रनेह निवासी मृतक महेंद्र लोधी का परिवार आज न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है कलेक्टर कार्यालय के बाहर 6 माह का मासूम बच्चा, विधवा पत्नी और हाथों में अस्थियां यह दृश्य व्यवस्था की संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल है।

एक ओर क्षेत्र के जनप्रतिनिधि यज्ञ-पूजन, नोहलेश्वर मेले क्रिकेट टूर्नामेंट और मंचीय कार्यक्रमों में व्यस्त हैं, तस्वीरें खिंच रही हैं,भाषण दिए जा रहे हैं, तालियां बज रही हैं, लेकिन जब एक परिवार अपने मृत परिजन की अस्थियां लेकर न्याय की गुहार लगा रहा है, तब जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति क्यों नहीं दिखती।

क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल मंचों तक सीमित है?

क्या पीड़ित परिवार के आंसुओं की कोई राजनीतिक कीमत नहीं?

जनता ने उन्हें इसलिए चुना था, कि वे संकट की घड़ी में साथ खड़े हों पर जब सबसे ज्यादा जरूरत है तब सन्नाटा क्यों है?

अब सवाल केवल जनप्रतिनिधियों से है चाहे वे विधायक हों या सांसद हो क्या इनका दायित्व केवल मंचों आयोजनों और स्वागत कार्यक्रमों तक सीमित है क्या जन प्रतिनिधियो का कर्तव्य यह नहीं की अपने क्षेत्र की जनता के सुख-दुख में साथ खड़े हो सके। पीड़ित परिवार की बात सुनकर और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कराने में सहयोग कर सके....

संवाददाता :- राजकुमारी ठाकुर