दतिया के लवेश नायक ने अंतरराष्ट्रीय जुझुत्सु में जीता रजत, देश का नाम किया रोशन


मध्यप्रदेश के दतिया जिले के छोटे से गांव उदगुवा से निकला एक नाम आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंज रहा है—लवेश नायक। यह सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता की कहानी नहीं, बल्कि उस जज़्बे की मिसाल है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस रखता है।

लवेश नायक ने श्रीलंका में आयोजित साउथ एशियन इंटरनेशनल जुझुत्सु प्रतियोगिता में रजत पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। यह उपलब्धि यूं ही नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे सालों की मेहनत, संघर्ष और अनुशासन छिपा है। जब दूसरे बच्चे सुविधाओं के बीच अपने सपनों को आकार देते हैं, वहीं लवेश ने अभावों के बीच अपने सपनों को जिंदा रखा और उन्हें हकीकत में बदल दिया।

एक साधारण किसान परिवार से आने वाले लवेश के पिता बृजेश नायक खेतों में मेहनत करते हैं। आर्थिक सीमाएं थीं, संसाधन कम थे, लेकिन हौसला और जिद बड़ी थी। यही जिद उन्हें मैदान तक ले गई और फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा दिया। आज वे 11वीं कक्षा के छात्र हैं, लेकिन उनकी सोच और लक्ष्य उम्र से कहीं आगे हैं।

लवेश की सफलता में उनके कोचों का भी अहम योगदान रहा है। जवान सिंह कुशवाहा और दर्शिका सक्सेना के मार्गदर्शन में उन्होंने अपने खेल को निखारा और हर चुनौती का सामना किया। यह गुरु-शिष्य का रिश्ता ही है जिसने इस प्रतिभा को तराशकर एक विजेता बना दिया।

लवेश की यह यात्रा यहीं नहीं रुकती। अब उनका चयन कजाकिस्तान में होने वाली एशियाई चैंपियनशिप के लिए हो चुका है। यह उनके करियर का अगला बड़ा पड़ाव है, जहां वे एक बार फिर भारत का तिरंगा ऊंचा करने के इरादे से उतरेंगे।

इससे पहले भी वे उत्तराखंड के हल्द्वानी में आयोजित प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं, जिससे यह साबित होता है कि उनका प्रदर्शन कोई एक बार की उपलब्धि नहीं, बल्कि लगातार मेहनत का परिणाम है।

लवेश का सपना साफ है—देश के लिए खेलना, पदक जीतना और भारत का नाम दुनिया में ऊंचा करना। उनकी कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटे शहरों और गांवों में रहकर बड़े सपने देखते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी उन्हें रोक देती है।

संवाददाता : किशोर कुशवाहा