जो जनता के भरोसे से जीतते हैं, वो सत्ता के भरोसे से गिरते भी हैं…

बीना विधानसभा की राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां भरोसा, अवसरवाद और राजनीतिक नैतिकता—तीनों का टकराव साफ दिखाई देता है। 2023 में कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल करने वाली विधायक निर्मला सप्रे ने जनता के विश्वास को अपने कंधों पर लेकर विधानसभा में कदम रखा था उस समय जनता को लगा था कि उन्होंने एक ऐसी प्रतिनिधि चुनी है जो उनके मुद्दों को मजबूती से उठाएगी और उनके संघर्षों की आवाज बनेगी।

लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव आते-आते तस्वीर पूरी तरह बदल गई। सत्ता की चमक, राजनीतिक आकांक्षाएं और कथित तौर पर धनबल के प्रभाव ने उनकी दिशा बदल दी। मुख्यमंत्री मोहन यादव के मंच पर भाजपा का दुपट्टा ओढ़कर उन्होंने जिस तरह से सार्वजनिक रूप से अपनी निष्ठा बदलने का संकेत दिया, उसने न केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं को बल्कि आम मतदाताओं को भी चौंका दिया।

सबसे दिलचस्प और विवादित पहलू यह है कि एक ओर वे भाजपा के कार्यक्रमों, बैठकों और प्रदेश कार्यालय में सक्रिय रूप से नजर आती हैं वहीं दूसरी ओर न्यायालय में उन्होंने हलफनामा देकर खुद को कांग्रेस का सदस्य बताया यह दोहरी स्थिति राजनीतिक ईमानदारी पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। क्या यह केवल सत्ता के साथ खड़े रहने की रणनीति है या फिर दोनों ओर लाभ लेने की कोशिश?

सूत्रों के हवाले से जो खबरें सामने आ रही हैं, वे और भी चौंकाने वाली हैं बताया जा रहा है कि स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं में यह नाराजगी है कि जो व्यक्ति कल तक उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहा था उसे अचानक शीर्ष नेतृत्व के सहारे पार्टी में स्थान कैसे मिल सकता है यही कारण है कि उन्हें पार्टी के अंदर वह सम्मान और स्थिरता नहीं मिल पा रही जिसकी शायद उन्हें उम्मीद थी।

दूसरी ओर इस्तीफा न देने के पीछे भी एक बड़ा राजनीतिक गणित नजर आता है यदि वे इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव मैदान में उतरती हैं, तो हार का खतरा साफ दिखाई देता है साथ ही यह भी तय नहीं है कि भाजपा उन्हें टिकट देगी या नहीं। ऐसे में वे एक ऐसी स्थिति में फंसी हैं जहां न पूरी तरह कांग्रेस में हैं न भाजपा में पूरी तरह स्वीकार्य।

आज उनकी राजनीतिक स्थिति “ना घर की रही, ना घाट की” जैसी बन गई है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का उदाहरण है जहां सिद्धांतों की जगह अवसरवाद लेता जा रहा है।

बीना की जनता अब सवाल पूछ रही है—क्या उनका वोट केवल सत्ता बदलने का माध्यम था? क्या जनादेश का सम्मान इसी तरह किया जाएगा? आने वाले समय में यह तय करेगा कि जनता ऐसे फैसलों को कैसे देखती है—सहिष्णुता से या सख्त जवाब देकर।