बागेश्वर धाम के पं. धीरेंद्र शास्त्री का बयान: लेंसकार्ट विवाद पर दी चेतावनी, धार्मिक प्रतीकों को लेकर छिड़ी बहस


उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आयोजित हनुमंत कथा के दौरान बागेश्वर धाम के प्रमुख कथावाचक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने एक बयान देकर नया विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने देश की जानी-मानी कंपनी Lenskart पर निशाना साधते हुए कथित ड्रेस कोड और धार्मिक प्रतीकों पर रोक को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और सामाजिक मंचों तक चर्चा तेज हो गई है।

यह पूरा मामला एक कथित कंपनी पॉलिसी डॉक्यूमेंट से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसमें दावा किया गया कि कर्मचारियों को तिलक, सिंदूर, मंगलसूत्र और कलावा जैसे धार्मिक प्रतीकों के साथ कार्यस्थल पर आने की अनुमति नहीं है। हालांकि कंपनी ने बाद में इन आरोपों को खारिज करते हुए सफाई दी है। बावजूद इसके, यह मुद्दा अब आस्था, पहचान और कॉर्पोरेट नीतियों के बीच टकराव का बड़ा विषय बन गया है।

कथा मंच से तीखा बयान

प्रयागराज में चल रही हनुमंत कथा के दौरान पं. धीरेंद्र शास्त्री ने मंच से सीधे तौर पर लेंसकार्ट का नाम लेते हुए कहा कि यदि किसी कंपनी को तिलक, चंदन, सिंदूर या मंगलसूत्र से समस्या है, तो उसे भारत में काम नहीं करना चाहिए। उन्होंने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा कि “जिन्हें राम, श्याम, हनुमान और सनातन से दिक्कत है, वे भारत छोड़ दें।” उनके इस बयान में भावनात्मक अपील के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान को लेकर गहरी चिंता भी झलकती है। उन्होंने हिंदू समाज से एकजुट होने की अपील करते हुए कहा कि आज यदि धार्मिक प्रतीकों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो भविष्य में यह सनातन परंपराओं और धार्मिक ग्रंथों तक भी पहुंच सकता है।

धार्मिक पहचान बनाम कॉर्पोरेट पॉलिसी

इस विवाद की जड़ एक कथित दस्तावेज बताया जा रहा है, जिसमें दावा किया गया कि कुछ धार्मिक प्रतीकों—जैसे बिंदी, तिलक और कलावा—को कार्यस्थल पर प्रतिबंधित किया गया है, जबकि हिजाब और पगड़ी को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी गई है। इस कथित असमानता को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। सोशल मीडिया एक्टिविस्ट शेफाली वैद्य ने इस मुद्दे को उठाते हुए सवाल किया कि यदि एक धर्म के प्रतीकों को अनुमति दी जा सकती है, तो दूसरे धर्म के प्रतीकों पर रोक क्यों। उनके पोस्ट के बाद यह मामला तेजी से वायरल हो गया और बड़ी संख्या में लोगों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

सोशल मीडिया पर बढ़ा विवाद

जैसे ही यह मुद्दा सामने आया, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर #Lenskart ट्रेंड करने लगा। कई यूजर्स ने कंपनी की आलोचना करते हुए इसे धार्मिक भेदभाव बताया, जबकि कुछ लोगों ने इसे कार्यस्थल की प्रोफेशनल नीति का हिस्सा मानकर समर्थन भी किया। कुछ संगठनों और समूहों ने विरोध के तौर पर लेंसकार्ट के शोरूम में जाकर कर्मचारियों को तिलक लगाया और कलावा बांधा। यह प्रदर्शन प्रतीकात्मक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता के समर्थन में किया गया। इस दौरान मंत्रोच्चार भी किया गया, जिससे यह मुद्दा और अधिक चर्चा में आ गया।

कंपनी की सफाई

विवाद बढ़ने के बाद लेंसकार्ट के सह-संस्थापक और CEO पीयूष बंसल ने सामने आकर स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कंपनी सभी धर्मों का सम्मान करती है और कर्मचारियों को अपने धार्मिक प्रतीक पहनने की पूरी स्वतंत्रता है उन्होंने यह भी कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे दावे भ्रामक हैं और कंपनी की आधिकारिक नीति का गलत प्रतिनिधित्व करते हैं। कंपनी की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि किसी भी कर्मचारी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता। हालांकि, विरोध कर रहे संगठनों ने इस सफाई को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है और उन्होंने मामले की पारदर्शी जांच की मांग की है।

पं. धीरेंद्र का एकजुटता का संदेश

अपने संबोधन में पं. धीरेंद्र शास्त्री ने संगम का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे गंगा, यमुना और सरस्वती मिलकर संगम बनाती हैं, वैसे ही समाज के सभी वर्गों को एकजुट होकर अपनी सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि समाज बंटा रहेगा, तो भविष्य में और भी बड़े मुद्दों पर सवाल खड़े हो सकते हैं। उनका यह संदेश समर्थकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ और इसे सोशल मीडिया पर भी व्यापक समर्थन मिला।